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दिवेर का महायुद्ध: हल्दीघाटी के बाद जहां महाराणा प्रताप ने मुगलों को चटाई थी धूल

मुगल बादशाह अकबर (Mughal Emperor Akbar) का सबसे खतरनाक सेना नायक हुआ करता था बहलोल खां। उसकी हाइट लगभग 7 फुट 8 इंच थी। कहा जाता है कि घोड़ा भी उसके सामने छोटा लगता था और वह अपने नाश्ते में एक बड़े बकरे के मांस जितना नाश्ता खा जाता था। बहुत चौड़ा और ताकतवर था बहलोल खां। कहा जाता है कि उसका हाथी जैसा बदन था और ताक़त का जोर इतना कि नसें फटने को होती थीं। 

अपने पूरे जीवन में एक भी लड़ाई कभी हारा नहीं था ये बहलोल खां। बादशाह अकबर (Mughal Emperor Akbar) को बहलोल खां पर बहुत नाज था। युद्ध में लूटी हुई औरतों में से बहुत सी बहलोल खां को सौंप दी जाती थी। शरीर से काफी भारी भरकम बहलोल खान की दानवता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 1 दिन के बच्चे को भी क्रूरता से मार देता था।

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) मेवाड़ (Mewad) के सिसोदिया वंश के राजकुमार थे। वे आजीवन मेवाड़ की सुरक्षा के लिए लड़ते रहे। वे मेवाड़ की सुरक्षा स्वतंत्रता और आजादी के लिए लड़ते रहे। वह अपने ही धुन के रखवाले थे । महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ऊंची कद काठी और भारी-भरकम हथियारों से हमेशा लैस रहते थे। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को अकबर से आजाद कराने के लिए शपथ भी खाई थी कि वे जब तक मेवाड़ को मुगलों से आजाद नहीं करवा लेते तब तक वे ना राजशाही बिस्तर पर सोएंगे, ना ही राजसी भोजन करेंगे और राजशाही सुखों का त्याग करेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया भी।


मुगलों से लड़ते हुए महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) को काफी दुखों का सामना करना पड़ा था। घास की रोटी भी खानी पड़ी थी लेकिन फिर भी उन्होंने कभी मुगलों के अधीन होना स्वीकार नहीं किया था।

दिवेर का महायुद्ध (Battle of Dewair 1582)

इतिहास में दर्ज है कि 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध (Battle of Haldighati) के बाद भी अकबर ने महाराणा को पकड़ने या मारने के लिए 1577 से 1582 के बीच करीब एक लाख सैन्य बल भेजे। अंगेजी इतिहासकारों ने लिखा है कि हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको उन्होंने 'बैटल ऑफ दिवेर' (Battle of Dewair) कहा है, मुगल बादशाह के लिए एक करारी हार सिद्ध हुआ था।  

कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़' की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) को 'मेवाड़ का मैराथन' बताया है (मैराथन का युद्ध 490 ई.पू. मैराथन नामक स्थान पर यूनान केमिल्टियाड्स एवं फारस के डेरियस के मध्य हुआ, जिसमें यूनान की विजय हुई थी, इस युद्ध में यूनान ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी)। 


कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे। 

दिवेर युद्ध (Battle of Dewair) की योजना महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने अरावली स्थित मनकियावस के जंगलों में बनाई थी। भामाशाह द्वारा मिली राशि से उन्होंने एक बड़ी फौज तैयार कर ली थी। बीहड़ जंगल, भटकावभरे पहाड़ी रास्ते, भीलों, राजपूत, स्थानीय निवासियों की गुरिल्ला सैनिक टुकड़ियों के लगातार हमले और रसद, हथियार की लूट से मुगल सेना की हालत खराब कर रखी थी।

हल्दीघाटी (Battle of Haldighati) के बाद अक्टूबर 1582 में दिवेर का युद्ध (Battle of Dewair) हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर (Akbar) का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा (Maharana Pratap) के हाथ में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे।  
 
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की सेना ने महाराज कुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर के शाही थाने पर हमला किया। यह युद्ध इतना भीषण था कि प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धंसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया।

अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसलिए वो खुद दिवेर युद्ध (Battle of Dewair) से दूर रहा। अकबर ने नरपिशाच बहलोल खां को भिड़ा दिया हिन्दू वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से। लड़ाई पूरे जोर पर थी और मुगलई गंद खा-खा के ताक़त का पहाड़ बने बहलोल खां का सामना हो गया वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से।


अफीम के ख़ुमार में डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आँखों से भगवा अग्नि की लपट सी प्रदीप्त रण के मद में डूबी आँखें टकराईं और शुरू हुई जबरदस्त भिडंत। कुछ देर तक तो महाराणा प्रताप यूँ ही मज़ाक सा खेलते रहे मुगलिया बिलाव के साथ और फिर गुस्से में आकर अपनी तलवार के एक ही वार से घोड़े सहित हाथी सरीखे उस नरपिशाच का पूरा धड़ बिलकुल सीधी लकीर में चीर दिया। ऐसा फाड़ा कि बहलोल खां का आधा शरीर इस तरफ और आधा उस तरफ गिरा।

स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि दिवेर के इस युद्ध (Battle of Dewair 1582) के बाद यह कहावत बनी कि "मेवाड़ के योद्धा सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया करते हैं"।  

दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) में अपने सिपाहसालारों की यह गत देखकर मुगल सेना में बुरी तरह भगदड़ मची और राजपूत सेना ने अजमेर तक मुगलों को खदेड़ा। भीषण युद्ध के बाद बचे-खुचे 36000 मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 

दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) ने मुगलों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया। दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया।   
 
स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि इसके बाद भी महाराणा (Maharana Pratap) और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के अधिकतर ठिकाने/ दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए। यहां तक कि मेवाड़ से गुजरने वाले मुगल काफिलों को महाराणा को रकम देनी पड़ती थी।

ऐसे-ऐसे युद्ध-रत्न उगले हैं सदियों से भगवा चुनरी ओढ़े रण में तांडव रचने वाली हमारी मां भारती ने।

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के पास कभी कोई बड़ा साम्राज्य नहीं था, उनके पास कभी सोने का सिंहासन नहीं था, उनके पास सोने के लिए सोने की खाट या भोजन करने के लिए सोने के बर्तन नहीं थे, उन्होंने कभी भी एक शाही राजा की तरह अपना जीवन नहीं जिया, जैसा कि अकबर (Mughal Emperor Akbar) और उनकी संप्रभुता के तहत अधिकांश शासकों के पास था।


महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने कभी गुलामी नहीं स्वीकार की और इसलिए उनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वह दुनिया भर में एक प्रेरणा बन गए। अमेरिकी सेना से वियतनाम की जीत एक ऐसा महान उदाहरण है जिसमें वियतनाम के लोगों ने हल्दीघाटी युद्ध (Battle of Haldighati) के बाद महाराणा (Maharana Pratap) और उनके जीवन भर के संघर्ष की प्रशंसा की जिसके कारण वे लंबे समय तक शक्तिशाली अमेरिकी सेना से लड़ने में सक्षम हुए और अंततः उनकी जीत हुई, बिल्कुल महाराणा प्रताप की गुरिल्ला जैसी समान युद्ध रणनीति के साथ।

जय महाराणा प्रताप!!
जय राजपूताना!!

*नोट :- यह लेख विभिन्न इतिहासकारों के लेखों पर आधारित है