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भोजपुरी को अश्लीलता का पर्याय बनाने वालों का करें बहिष्कार

एक जमाना था जब Bollywood पर भी भोजपुरी (Bhojpuri) भाषा और गीत हावी थे। यही कारण था कि बॉलीवुड ने नदिया के पार जैसी सुपरहिट फिल्म बनाई। जिसके मधुर गीत आज भी हमें हमारी भोजपुरी माटी और संस्कृति की झलक दिखाते हैं। उस दौर के भोजपुरी गीतों में हमें अपनी खांटी गंवई संस्कृति की झलक देखने को मिलती थी। 


वैसे तो मेरा पूरा बचपन भोजपुरी परिवेश से दूर जबलपुर (मध्यप्रदेश) में ही बीता, लेकिन मुझे आज भी याद है कि उन दिनों वहां जो भी यूपी बिहार के लोग रहा करते थे, सबके पास एक कैसेट प्लेयर हुआ करता था और सबके पास भोजपुरी गानों के सभी कैसेट का कलेक्शन जरूर होता था। और जैसे ही किसी नई भोजपुरी फिल्म के गानों का कैसेट बाजार में आता सबलोग उसे तुरंत खरीद लेते थे।

उन दिनों 'गंगा किनारे मोरा गांव' जैसी भोजपुरी फिल्मों के गाने जबलपुर में रहने वाले हर यूपी बिहार वालों के यहां रोज ही बजा करते थे। जैसे इस फिल्म का वो छोटे बच्चे पर फिल्माया गया भावुकता भरा टाइटल सॉन्ग 'गंगा किनारे मोरा गांव हो घर पहुंचा द गंगा मईया' । बचपन के उन दिनों में भोजपुरी परिवेश से कोसों दूर बुंदेलखंड में रहकर भी इन भोजपुरी गीतों को जब कभी भी हमने देखा सुना तो हमें अपनी भोजपुरी माटी की खुशबू का एक अनोखा अहसास हुआ। 


उस दौर के वो भोजपुरी गीत भोजपुरिया समाज के हर व्यक्ति, जो चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रहे, उसे उसकी माटी और संस्कृति से बांधे रखते थे। यूपी बिहार वाले चाहे कहीं भी रहें जब भोजपुरी गीत सुनते तो अपने गांव गिरांव की याद तरो-ताजा हो जाती थी। 

वो दौर ऐसा था जब हम अपने भोजपुरी होने पर गर्व कर सकते थे, क्योंकि उस दौर की फिल्मों में भोजपुरी संस्कृति का गरिमामय और संस्कारी रूप देखने को मिलता था। उस दौर में भोजपुरी का मतलब मान, मर्यादा, त्याग, बलिदान, अच्छे संस्कार और बड़ों का आदर सम्मान होता था।

लेकिन बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज के इस दौर में भोजपुरी फिल्मों और गानों को अश्लीलता का पर्याय समझा जाने लगा है। अब भोजपुरी फिल्में और गीत अश्लीलता के रोज नए रिकॉर्ड बनाने में लगे हैं। वर्तमान में एक भी ऐसे भोजपुरी गाने आपको नहीं मिलेंगे जिन्हें आप अपने बड़ों और परिवार के साथ बैठकर देख सुन सकें।


पहले एक भोजपुरी गाना था 'भैया हमार राम जईसन, भौजी हमार सीता, उनके वचन जैसे रामायण और गीता...' हमारी भोजपुरी संस्कृति में भाभी को मां के बराबर दर्जा प्राप्त है और आजकल के भोजपुरी गानों को देखिए तो भाभी को एक अलग ही रूप दे दिया गया है। क्या भाभी को लेकर अश्लील गाने लिखने वाले अपने घरों में अपनी भाभियों को भी उसी रूप में देखते होंगे? 

अश्लीलता परोसकर पैसे कमाने की लालच में अंधे निर्माता निर्देशकों की नई फसल ने हमारी भोजपुरी संस्कृति को ही कलंकित करके रख दिया है। आज के भोजपुरी गीतों को सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है। जबकि एक वो दौर था जब हमें अपनी भोजपुरी माटी से दूर रहकर भी भोजपुरी गाने सुन अपनी मिट्टी और संस्कृति से लगाव महसूस होता था।


अश्लील गाने और फिल्में बनाकर शॉर्टकट से पैसे कमाने वालों ने हमारी खांटी भोजपुरी संस्कृति को ही भ्रष्ट कर दिया है। क्योंकि व्यवसायीकरण के इस दौर में सबका एकमात्र लक्ष्य पैसे कमाना ही रह गया है। समाज और संस्कृति की किसको पड़ी है, सब बस अपनी जेबें भरने में लगे हैं।

जरा गौर फरमाइए आजकल के इन भोजपुरी फिल्मी गानों की लाइनों पर, जिन्हें यहां लिखने में भी मेरे हाथ नहीं चल रहे...

' जब लगावे लु तू लिपिस्टिक, हिलेला आरा डिस्टिक, जिला टॉप लागे लू '

मनोज तिवारी ये गाना गाके इतने बड़े स्टार बन गए कि भाजपा ने उन्हें अपनी पार्टी से टिकट देकर सांसद तक बनवा दिया। सही है आखिर देश और समाज के लिए इन्होंने इतना बड़ा योगदान जो किया था ।


नथुनिया पर गोली मारे....गाने ने शादी ब्याह में कितनी गोलियां चलवाई, कितनों की जान ली और कितना बवाल कराया ये तो आप सब जानते ही होंगे?

ऐसे अनगिनत भोजपुरी गाने हैं जिनको बनाने वालों को भले न शर्म आई हो लेकिन यहां लिखने में मुझे जरूर शर्म महसूस हो रही है। ये गीत नहीं हैं हमारी भोजपुरी संस्कृति के मुंह पर एक बदनुमा दाग हैं। 

पैसे कमाने और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में इन लोगों ने हमारी गौरवशाली भोजपुरी संस्कृति को अश्लीलता का पर्याय बनाकर रख दिया है। 


जरा सोचिए कि किसी ऑटो रिक्शा में ऐसा ही कोई भोजपुरी गाना बज रहा हो और कोई महिला उसमें बैठी हो तो उसकी क्या मनोदशा होगी? वो महिला उनमें से किसी एक के घर की भी हो सकती है जो इस तरह के वाहियात भोजपुरी गानों को तैयार करने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।

यहां कुछ लोग ये सवाल उठा सकते है कि लोग ऐसे अश्लील गाने और फिल्में पसंद करते हैं तभी तो बनते हैं। तो इसका जवाब ये है कि इसी दौर में तो लोग अभिलिप्सा पांडा के 'हर हर शंभू' भजन को भी पसंद करते हैं। 

ऐसा किसने कह दिया कि आज के दौर में सिर्फ अश्लील गाने और अश्लील फिल्में ही चलेंगी?


यदि ऐसा होता तो क्या 'The Kashmir Files' जैसी फिल्म को इतनी बड़ी सफलता मिलती? क्या उस फिल्म में कुछ भी मसाला टाइप मनोरंजन था, जिसे आजकल समय की मांग कहकर लगभग हर फिल्म में धड़ल्ले से परोसा जा रहा है?

मनोरंजन भी दो तरह का होता है, एक स्वस्थ मनोरंजन और दूसरा अश्लीलता पूर्ण जिसे मनोरंजन की बजाय मानसिक प्रदूषण कहना ज्यादा सही होगा। जो लोग स्वस्थ मनोरंजन परोसने के काबिल नहीं होते वे समाज में प्रदूषण ही फैलाते हैं। क्योंकि हर कोई 'The Kashmir Files' जैसी फिल्म बनाने वाले विवेक अग्निहोत्री जैसी सोच और काबिलियत नहीं रखता।


सबसे बड़ा सच तो यही है कि हमारे समाज में अश्लील भोजपुरी गानों के बढ़ते चलन और भोजपुरी संस्कृति के इस बिगड़े रूप के लिए कहीं न कहीं हम आप भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि जब तक ऐसे अश्लील गानों और फिल्मों को लोग पसंद करते रहेंगे ये बनना बंद नहीं होगा। 

जैसा Boycott अभियान Bollywood के खिलाफ चला है वैसा ही हर अश्लील भोजपुरी फिल्म और गाने के खिलाफ चलाना होगा तभी ये सब बनना बंद होगा।


एक और तरीका है इसे रोकने का, जहां भी अश्लील और वाहियात गाने बजते हुए देखें, सब मिलकर विरोध करें और हर हाल में उसे बंद करने पर मजबूर करें। जब सार्वजनिक रूप से विरोध होगा तो कोई हिम्मत नहीं करेगा ऐसे फूहड़ और वाहियात गानों को बजाने की। 

यदि हम ये सोच कर बैठे रहेंगे कि सरकार इस अश्लीलता पर रोक लगाएगी तो ऐसा कभी नहीं होनेवाला, क्योंकि सरकार को तो सबका वोट चाहिए, जो ऐसे गानों को बनाते हैं उनका भी और जो इसे पसंद करते हैं उनका भी। और सरकार क्या करती है इसके लिए ऊपर मनोज तिवारी वाला उदाहरण आप सबने पढ़ा ही होगा ।

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