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घमंडी राजा की कहानी

एक राज्य में एक राजा राज करता था। वह एक शानदार महल में रहता था, जो कीमती पत्थरों से बना था और जिसमें तरह-तरह की नक्काशियां की हुई थीं। महल इतना सुंदर था कि उसके चर्चे दूर दूर तक फैले हुए थे। उसके महल के मुकाबले का महल आसपास के किसी भी राज्य के राजा के पास नहीं था।

जो भी राजा का महल देखता, उसकी प्रशंसा के पुल बांध देता। अपने महल की प्रशंसा सुनकर राजा फूला नहीं समाता। धीरे धीरे उसमें घमंड घर कर गया। जो भी उसके महल में आता, वह अपेक्षा करता कि उसके महल की प्रशंसा करे। यदि कोई उसके महल की प्रशंसा नहीं करता, तो उसे बुरा लग जाता था।

एक बार एक साधु उसके दरबार में आया। साधु से शास्त्र ज्ञान लेने के बाद राजा ने उससे कहा, “गुरुवर! आज की रात आप यहीं ठहरें। मैं आपके रुकने की व्यवस्था करवाता हूं।”

साधु ने स्वीकृति देते हुए उत्तर दिया, “राजन्! इस सराय में मैं अवश्य ठहरूंगा।”

अपने महल को सराय कहे जाने पर राजा के अहंकार को चोट लगी। वह आगबबूला होकर बोला, “गुरूवर! आप इस महल को सराय कह इसका अपमान कर रहे हैं। ऐसा महल दूर दूर तक ढूंढने पर भी आपको नहीं मिलेगा। यहां ठहरना आपका सौभाग्य होगा, अन्यथा दर दर भटकने वाले साधु के भाग्य में तो एक टूटी फूटी कुटिया भी नहीं होती। कृपया आप अपने शब्द वापस लीजिए।”

साधु मुस्कुराते हुए बोला, “राजन! जो सत्य है, मैंने वही कहा। मैं अपने शब्द वापस नहीं लूंगा। ये मेरी दृष्टि में एक सराय ही है।”

“यदि ऐसा है, तो सिद्ध करके दिखाइये।” राजा ने साधु को चुनौती दी।

“ठीक है! मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो।” साधु ने कहा।

“पूछिए!”

“आपसे पहले ये महल किसका था?”

“मेरे पिताश्री का।”

“उसके पहले?”

“उनके पिताश्री अर्थात् मेरे दादाश्री का।”

“उसके पहले?”

“उनके पिताश्री! इस महल का इतिहास बहुत पुराना है।” राजा ने बताया।

साधु ने कहा, “आपकी बात ही सिद्ध करती है राजन कि ये महल एक सराय है, जिसमें आपकी पीढ़ियां रहती आ रही हैं। आपके दादा श्री भी रहे, उसके बाद आपके पिता श्री। फिर उन्हें इसे छोड़कर जाना पड़ा, ठीक वैसे ही, जैसे सराय में कुछ दिन रहने के बाद उसे छोड़कर जाना पड़ता है। आप भी एक दिन इस सराय को छोड़कर चले जायेंगे, तो फिर इसका इतना घमंड क्यों?”

साधु की बात सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ। उसकी आंखों पर पड़ा घमंड का पर्दा उठ गया। वह हाथ जोड़कर साधु से बोला, “गुरुवर! आपने आज सत्य से मेरा सामना करवाया। अब तब मैं अपने अहम में डूबा हुआ था। मुझे क्षमा कर दें।”

साधु ने राजा की क्षमा किया और उस रात महल में रुककर अगले दिन वहां से प्रस्थान कर लिया।

मित्रों" ये संसार एक सराय की तरह है, जहां लोग आते हैं और कुछ दिन रहने के बाद चले जाते हैं। यहां से आप कुछ भी लेकर नहीं जाएंगे। लेकिन यदि आप कुछ देकर गए, तो सदा इस संसार में आपका नाम अमर रहेगा। इसलिए अच्छे कर्म कीजिए, लोगों की सेवा कीजिए और इस दुनिया को बेहतर बनाने में अपना योगदान दीजिए।

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