लोकसभा चुनावों में भाजपा के खराब प्रदर्शन के मुख्य कारण

मित्रों, Loksabha Election 2024 Result बेहद चौंकाने वाले हैं। इस बार सभी न्यूज चैनल्स के Exit Poll की हवा निकल गई। जो भी परिणाम आए हैं वे बेहद चौंकाने वाले तो हैं ही साथ ही इसे भाजपा के लिए एक बड़े खतरे का संकेत भी माना जा सकता है।

इस बार के Loksabha Election 2024 Result से एक ओर जहां Congress और SP को संजीवनी मिली है वहीं BJP को बहुत तगड़ा झटका भी लगा है।

Ram Mandir Ayodhya को Loksabha Election 2024 का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र समझने वाली BJP अयोध्या में ही चुनाव हार गई। भाजपा के लिए ये एक बहुत बड़ा झटका है।

आइए, आज हम Loksabha Election 2024 में भाजपा के खराब प्रदर्शन और यूपी में अधिकतर सीटें गंवा देने के मुख्य कारण जानने का प्रयास करते हैं।

सरकारी विभागों का प्राइवेटाइजेशन करना और सरकारी विभागों में ठेकेदारों के माध्यम से संविदा पर भर्ती करना कहां तक न्याय संगत है। Agniveer जैसी योजना, जो शायद ही किसी को पसंद हो, ऐसी योजना को क्यों जबरदस्ती जनता पर थोपा गया? 

सरकारी नौकरी के लिए कोई युवा क्यों जी जान लगाता है? क्योंकि वहां उसे अपना और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित महसूस होता है। लेकिन सरकारी नौकरियों से पेंशन खत्म करना और सेना के लिए Agniveer Yojana लाना लोगों के आक्रोश की बड़ी वजह है। 

अभी सिर्फ सेना भर्ती में ही आरक्षण नहीं लागू है जिससे सवर्णों के बच्चों को सेना में भर्ती होने में थोड़ी आसानी थी, लेकिन इसमें भी सरकार ने Agniveer जैसी वाहियात योजना लाकर सवर्णों के हाथ से सरकारी नौकरी का ये अवसर भी छीन लिया है। 

सभी सरकारी नौकरियों में पेंशन पहले ही खत्म की जा चुकी थी सिर्फ सेना में ही बची थी, उसे भी खत्म करने के लिए Agniveer जैसी योजना ला दी गई। ये भी एक बड़ा कारण बना है BJP को इस चुनाव में सवर्णों का वोट न मिलने का।

पुरानी पेंशन योजना की मांग को लेकर लाखों सरकारी कर्मचारी पूरे देश में लंबे समय से भाजपा सरकार से नाराज चल रहे हैं। ऐसे सभी कर्मचारियों ने इस बार भाजपा के खिलाफ वोट दिया है।

Ayodhya में BJP की हार के बाद लोग अयोध्या वासियों को गाली दे रहे हैं, उन्हें गद्दार बता रहे हैं, लेकिन किसी ने उनका दर्द जानने की कोशिश नहीं की।

Ayodhya Ram Mandir निर्माण के लिए और अयोध्या को अंतरराष्ट्रीय टूरिस्ट प्लेस बनाने के लिए लोगों के घर तोड़ दिए गए, खेत खलिहान जबरन ले लिए गए। मुआवजे के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई।

लगभग हर गांव, शहर और कस्बे में विकास और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर लोगों की दुकानें, खेत और घर उजाड़े गए। जिसकी रोजी रोटी का स्रोत और आशियाना उजड़ जायेगा वो वोट के जरिए अपना गुस्सा तो निकालेगा।

एक एक व्यक्ति का आंसू वोट में तब्दील हो गया, लोकतंत्र की यही खूबसूरती है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि अयोध्या सीट भाजपा क्षत्रियों की नाराजगी से भी हारी है। 500 वर्षों से अयोध्या को बचाने के लिये वहाँ सूर्यवंशी क्षत्रियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी संघर्ष किया, साफा और पगड़ी और जूते तक त्याग किया। उन सूर्यवंशियों को श्रीराम मंदिर की स्थापना की मुख्य पूजा में आमंत्रित नहीं करना, उस दिन वहाँ केे स्थानीय क्षत्रियों को नजरबंद करना, उनको अपमानित करना आदि भी अयोध्या में हार का कारण बना।

स्थानीय लोगों ने बताया कि श्रीराम मंदिर ट्रस्ट में एक भी क्षत्रिय को स्थान नहीं देना, विग्रह स्थापना में असली वंशजों की जगह नकली वंशज विमलेन्द्र मोहन मिश्र से विग्रह स्थापना करवाना। कारसेवकों पर गोली चलवाने के आदेश देकर हज़ारों कारसेवकों की हत्या कराने वाले को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट का मुख्य ट्रस्टी बनाना, उसके बेटे को श्रावस्ती से टिकट देना, कारसेवकों के हत्यारे को देश का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्म विभूषण देना, राम के वंशजों को अखर गया और उन्होंने अपना पूरा जोर लगाकर भाजपा को अयोध्या से निपटा दिया।

भाजपा सरकार द्वारा सिर्फ दलित और पिछड़े की बात करना भी एक बड़ी वजह बना है इस चुनाव में। बीजेपी के सवर्ण कोर वोटर जो निस्वार्थ भाव से भाजपा को वोट देते आ रहे थे, बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों द्वारा उनके बारे में अनाप शनाप बयान देना एक बड़ी वजह बना बीजेपी को सवर्णों, खासकर क्षत्रियों का वोट न मिलने का।

क्षत्रिय वोटर्स की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह देश भर के 80 से अधिक क्षत्रिय सांसदों का टिकट काटा जाना है। जनरल बीके सिंह जो पिछले लोकसभा चुनावों में 10 लाख से अधिक वोटों से जीते थे उनका टिकट तक काट दिया गया।

वहीं दूसरी ओर कमलेश पासवान जैसे सांसद जिन्हें उनके लोकसभा क्षेत्र बांसगांव का हर निवासी कोसता है, क्योंकि वो 5 वर्षों में कभी एक बार भी अपने संसदीय क्षेत्र में पैर तक नहीं रखते हैं। ऐसे लोगों को इस बार भी टिकट दे दिया गया। जिसका नतीजा ये हुआ की वो हारते हारते बचे। 

बांसगांव लोकसभा सीट से इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी सदल प्रसाद ने कमलेश पासवान को बहुत कड़ी टक्कर दी और कई राउंड में वो कमलेश पासवान से आगे भी निकलते दिखे। सदल प्रसाद ने मतगणना में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पुन: काउंटिंग कराए जाने की मांग भी की है।

टिकट बंटवारे में क्षत्रियों के साथ इस तरह का सौतेला बर्ताव क्षत्रिय समाज बर्दाश्त नहीं कर सका, क्योंकि उन्हें लगा की भाजपा क्षत्रिय विरोधी पार्टी बन चुकी है। इसी खुन्नस में अधिकांश क्षत्रियों ने यूपी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया। क्षत्रिय समाज के बड़े नेता राजा भईया का भाजपा को छोड़ सपा को समर्थन देना भी एक बड़ी वजह बना क्षत्रिय वोटों के सपा में जाने का।

यूपी में टिकट बंटवारे की पूरी कमान खुद अमित शाह ने संभाल रखी थी। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टिकट बंटवारे से पूरी तरह दूर रखा गया, जबकि उनको अपने प्रदेश के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ज्यादा जानकारी है कि कौन टिकट देने लायक है या नहीं। पार्टी हाईकमान द्वारा सीएम योगी को नजरंदाज करना एक बड़ी वजह है यूपी में बीजेपी की हार की।

अगर पवन सिंह का टिकट आसनसोल से वापस लेने के बाद यूपी, बिहार, झारखण्ड में किसी भी सीट से लड़वा देते तो आज बिहार की 4 सीटें नहीं हारते।

गाजियाबाद से क्षत्रिय का टिकट काटने के बाद विरोध होता देख मेरठ, गौतम बुद्ध नगर या गाजियाबाद से किसी ठाकुर ( संगीत सोम) को लड़ा देते तो पश्चिम में आधे दर्जन सीटें बच जाती।

अगर राजा भैया से गठबंधन नही करना था कोई बात नही, लेकिन अनुप्रिया पटेल, राजभर, संगम लाल गुप्ता से क्षत्रियों के खिलाफ अनाप शनाप भाषण न दिलवाते तो अगल बगल की 5 सीट बच जाती।

जौनपुर में अगर धनज्जय सिंह को जेल न भेजकर उन्हें टिकट दिया गया होता तो दोनो सीटों पर ऐसा माहौल कभी नही बनता।

17-18 सीट तो सिर्फ अपनी मूर्खता और ओवर कॉन्फिडेंस से हारी है भाजपा। 

क्षत्रियों के विरोध को BJP और Amit Shah ने बहुत हल्के में ले लिया था।

क्षत्रिय वोटर्स के नाराज होने के मुख्य कारण :

- EWS सरलीकरण ना करना
- रूपला, बालियान, अमित शाह, शुभकरण, राजभर, अनुप्रिया कैसे नेताओं का बड़बोलापन
- बीजेपी IT सेल का क्षत्रिय विरोध
- इतिहास विकृतिकरण
- राम मंदिर में क्षत्रियों को दरकिनार करना
- क्षत्रिय बाहुल्य सीटों पर क्षत्रियों के टिकट काटना
- प्रदीप चौधरी, संजीव बाल्यान, शुभकरण, कैलाश चौधरी, अनुप्रिया, राजभर जैसे नेताओं का अखंड जातिवाद

उत्तर प्रदेश का जनादेश कई संदेश लिए हुए है। मंदिर-मस्जिद नहीं चला। हिंदू-मुसलमान नहीं चला। तालिबान-पाकिस्तान नहीं चला। राम, राशन और राष्ट्रवाद भी नहीं चला। 

तो क्या चला ? 

संविधान, आरक्षण, रोजगार, महंगाई, अग्निवीर, एमएसपी, गांव ग्रामीण की समस्या, पुलिस का डंडा, प्रशासन का मकड़जाल, मध्यम वर्ग पर टैक्स टेरर, व्यापारी GST से बेहाल। गांव में तबाह आर्थिक स्थिति। सांसदों का अहंकार। 

जनादेश का संदेश है की अब बातें ही नहीं। लोगों को बदलाव अपने सामने चाहिए।

अयोध्या से बीजेपी हार गई। संदेश दीवार पर लिखा है। "राम, रोम रोम में हैं। लेकिन आपको जो दायित्व दिया है उसकी मर्यादा न लांघे। काम करो। जनता का जीवन आसान करो।"

अति पिछड़े और दलित वर्ग को अपने अधिकार चाहिए। राम, राशन, राष्ट्रवाद तो चाहिए लेकिन रोजगार भी इसके साथ जरूर चाहिए। वरना जो देगा उसके साथ जाएंगे।

कुछ पिछड़े नेताओं को ही "पूरा समाज" मानकर पुरस्कार लेने वालों को जनता ने खारिज कर दिया है।

कुर्मी, कुशवाहा, राजभर, निषाद, जाटव, पासी प्रजापति, बिंद केवट, मल्लाह और राजपूत। इस बार इनका वोटिंग पैटर्न, शोध का विषय है। जो खुली किताब जैसे हैं वो मुसलमान बिरादरी। वोट वहीं जायेगा, जो बीजेपी को हराएगा। 

अगला संदेश

बीएसपी पतन की ओर अग्रसर है। ये किस तलातल पर जाके रुकेगा कोई नही जानता। इस चुनाव सीटों और वोट प्रतिशत में कांग्रेस उससे आगे है। तीसरे नंबर का ताज अब यूपी में कांग्रेस के पास है। बीएसपी सिंगल डिजिट वोट शेयर पर आ गई है।

अखिलेश यादव और राहुल गांधी यूपी में बहुजन के नए नायक हैं। बहुजन के लिए बहन जी उनकी देवी हैं लेकिन वोट उन्हे नहीं देंगे या बहुत कम देंगे। उन्हे इस जोड़ी में भविष्य दिखता है।

जनादेश का संदेश 

युवा को काम, बेटियों को बराबरी, व्यापारी को धंधा, किसान को एमएसपी, महिलाओं को मदद, गरीब को राशन। लेकिन रोज रोज याद दिलाना की राशन देते हैं, ये उनके आत्मसम्मान को कचोटता है। समाज शासन और सरकार में हिस्सेदारी हक समझ के दीजिए उन्हे।

दलित और पिछड़े अब एक प्लेटफार्म पर आ गए हैं। वो अपनी ताकत को पहचान गए हैं। वो एजेंडा और प्रोपोगंडा सब समझते हैं। यूपी के सामाजिक तानेबाने मे ये सब बातें "लाउड एंड क्लियर" है। 

सवर्णों का अब भाजपा से पूरी तरह मोह भंग होने लगा है। उन्हें भाजपा अब सवर्ण विरोधी पार्टी दिखाई देने लगी है। इसलिए यदि भाजपा को फिर सत्ता में वापस आना है तो अपने सवर्ण वोटर्स को भी फिर से विश्वास दिलाना होगा और उनके लिए भी कुछ सरकारी योजनाएं लेकर आना होगा, वरना BJP का इससे भी बुरा हाल आने वाले चुनावों में हो सकता है।

BJP को इस सोच से निकलना होगा की जिनका वोट ज्यादा है सिर्फ वही चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। जिनका वोट कम है, वो भी चुनाव के नतीजे बदल सकते हैं।
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