खाने पीने की चीजों और खेती में खतरनाक केमिकल्स के प्रयोग पर रोक क्यों नहीं?

आजकल आलम ये है की हम सब जो भी कुछ खा पी रहे हैं वह हमें स्वस्थ बनाने की बजाय बीमार बना रहा है, चाहे वो हरी साग-सब्जी ही क्यों न हो. 

हर क्षेत्र में व्यवसायीकरण की देन है की केमिकल, फर्टिलाइजर और पेस्टीसाइड का इस्तेमाल जमकर किया जा रहा है, भले ही लोग उसे खाकर बीमार पड़ें या मरें. 
सबका बस एक ही उद्देश्य बन गया है, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना. जिसके लिए लोगों ने एकमात्र उसूल बना लिया है 'अपना काम बनता तो भाड़ में जाए जनता'

जरा सोचिए, एक शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति जो सिर्फ हरी साग सब्जी ही खाता है, वो भी आज के समय में स्वस्थ नहीं है. क्योंकि जो हरी साग सब्जी वो खा रहा है उसके उगाने में जहरीले कैमिकल्स और फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल होता है और जहरीले कैमिकल वाले पेस्टीसाइड का छिड़काव उसकी पत्तियों पर किया जाता है. 
ये सभी जहरीले केमिकल्स इन सब्जियों के माध्यम से व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर जानलेवा बीमारियों की वजह बन रहे हैं.

आपको अक्सर सुनने में आता होगा कि फलां व्यक्ति जो अभी बहुत कम उम्र का था लेकिन अचानक पता चला की उसकी किडनी ही खराब हो चुकी है या उसे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो गई है या उसका लीवर ही खराब हो गया है. 

30-40 की उम्र में अचानक हार्ट फेल हो जाना या किसी गंभीर जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाना आजकल आम बात हो गई है.
सभी अस्पताल मरीजों से खचाखच भरे पड़े हैं, हर डॉक्टर के यहां मरीजों की लंबी -लंबी कतारें दिखाई देती हैं. जिसे देखो वही बीमार है. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति बचा हो जिसे कोई रोग न हो या वो कोई दवा न खाता हो.

सरकार चाहे जितने नए अस्पताल खोलती चली जा रही है लेकिन मरीज इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं की सब संसाधन कम ही पड़ रहे हैं. हर अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ और डॉक्टरों का अभाव है.

छोटे छोटे बच्चे पैदा होते ही गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जा रहे हैं, जबकि आजकल पहले की अपेक्षा बेहतर खान पान और स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं.
क्या आपने कभी सोचा है कि आज के समय में पुराने समय की अपेक्षा बेहतर खानपान और जीवन स्तर होने के बावजूद हर कोई बीमार क्यों है?

एक पहले का दौर था जब लोगों को ठीक से भोजन तक की व्यवस्था नहीं हो पाती थी. न तो इतनी बेहतर सुविधाएं मौजूद थी और न ही इतना हाइजेनिक लाइफस्टाइल था. 

दिन भर धूप और धूल में खेतों में मेहनत करके, रूखी सूखी खाकर और कुएं का पानी पीकर लोग सौ साल से भी ज्यादा स्वस्थ जीवन जिया करते थे.
एक आज का दौर है जब पूरी तरह हाइजेनिक जीवन शैली के बावजूद, एसी में रहकर और आरओ का शुद्ध पानी पीकर भी हर कोई बीमार है.

लोग भरी जवानी में अचानक किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं. जो 60 साल की उम्र तक जी गया वो खुद को बड़ा खुशकिस्मत समझ रहा है. 

जो किसी प्रकार का कोई नशा नहीं करता, मांस मदिरा, सिगरेट, तंबाकू, गुटखा आदि का सेवन नहीं करता उसे अचानक पता चलता है की कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो गई या उसकी किडनी ही खराब हो गई.
बीपी शुगर की बीमारी का तो वो हाल है की शायद ही देश का कोई घर ऐसा बचा हो जिस घर में बीपी शुगर के मरीज न हों.

आज हमारा पूरा देश बीमार है, देश का हर घर, हर परिवार बीमार है, छोटे छोटे बच्चे जो इस देश के भविष्य हैं वो इस देश का भविष्य तक बीमार है.

और इसकी वजह है खाने पीने की चीजों में खुलेआम जहरीले केमिकल्स की मिलावट, खेती में अंधाधुंध फर्टिलाइजर्स, केमिकल्स और पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल.
क्या हमें इस अंधाधुंध व्यवसायीकरण और औद्योगिकरण की कीमत अपनी जान देकर चुकानी होगी?

ये कैसी तरक्की है जिसकी कीमत देश के नागरिकों को अपना स्वास्थ्य और जान देकर चुकानी पड़ रही है?
क्या सरकार को खाने पीने की चीजों में और खेती में केमिकल, फर्टिलाइजर और पेस्टीसाइड के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाने चाहिए? 

जिस देश के नागरिक ही स्वस्थ नहीं होंगे उस देश का भविष्य क्या होगा?
क्या कोई देश व्यवसायिक तरक्की के लिए अपने देश के नागरिकों का स्वास्थ्य और जीवन दांव पर लगा सकता है?

©SanjayRajput.com

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