Header Ads

काश ज़िंदगी सचमुच किताब होती

काश ज़िंदगी सचमुच किताब होती! 
पढ़ सकता मैं की आगे क्या होगा? 
क्या पाऊँगा मैं और क्या दिल खोयेगा? 
कब थोड़ी खुशी मिलेगी, कब दिल रोयेगा? 
काश ज़िंदगी सचमुच किताब होती! 
फाड़ सकता मैं उन लम्हों को, 
जिन्होंने मुझे रुलाया है... 
हिसाब तो लगा पाता, 
कितना खोया और कितना पाया है?
काश ज़िंदगी सचमुच किताब होती! 
वक़्त से आँखें चुराकर पीछे चला जाता...
टूटे सपनों को फिर से अरमानों से सज़ाता, कुछ पल के लिए मैं भी मुस्कुराता... 
काश ज़िंदगी सचमुच किताब होती!!


No comments:

Powered by Blogger.