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कहीं आप भी अपने बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन के रूप में डिजिटल बारूद तो नहीं दे रहे?

अभी कुछ दिन पहले TikTok स्टार फैजल का एक वीडियो ट्विटर पर वायरल हुआ था। इस वीडियो में फैजल अपनी बेवफा प्रेमिका के मुंह के ऊपर कुछ ऐसा फेंकता हैं कि लड़की का मुंह एसिड अटैक से झुलसी लड़की के जैसा दिखाई देने लगता है। 

इस वीडियो को देखते ही डिजिटल दुनिया में भूचाल आ गया था। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा भी एक्शन में आ गई और #BanTikTok पूरी दुनिया में ट्रेंड करने लगा। इसके फलस्वरूप दुनिया में सबसे ज्यादा TikTok यूज करने वाले देश भारत में इस ऐप की रेटिंग तेजी से गिरने लगी।

दबाव में आकर TikTok ने फैजल का अकाउंट डिलीट किया और पहली बार अपने कंटेंट के लिए स्टिक टर्म्स एंड कंडीशन जारी किया। इसको पढ़कर TikTok पर लिपस्टिक लगा नाचने वाले टिकटोकर नाराज़ हो गए की अरे हमारे फैजू भैया को काहे हटा दिए? जो लड़के लड़की बनकर हर वीडियो में कमर हिलाते रहते हैं उनकी भुजाएं भी फड़कने लगी। जो अभिभावक खुद अपने छोटे छोटे लड़के लड़कियों से इसी तरह के वीडियो बनवाते हैं वह अपने हीरो की दुर्दशा पर दुखी होने लगे।

अब एक और घटना मई में दिल्ली में हुई।  दिल्ली के एक मॉडर्न और हाई-फाई स्कूल में पढ़ने वाले 14 साल के कुछ बच्चे इंस्टाग्राम पर एक ग्रुप बनाते हैं और उस ग्रुप का नाम रखते हैं बॉयज लॉकर रूम। उस लॉकर रूम में तमाम लड़कियों के न्यूड फोटो की रेटिंग दी जाती है। उनकी बनावट और फिगर के ऊपर वल्गर और भद्दे कमेंट किए जाते हैं। 

एक दिन उसी ग्रुप का एक मेंबर उस ग्रुप में अपनी एक जानने वाली लड़की का फोटो देख लेता है और बहुत shocked होता है और वो स्क्रीनशॉट कहीं और शेयर कर देता है। देखते ही देखते स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आने लगा, लड़कों को जेल भेजने के तमाम फैसले सुनाए जाने लगे। तमाम बड़े लोगों ने इन लड़कों के ऊपर कार्रवाई करने का फतवा जारी कर दिया। फिर यह मामला साइबर सेल तक पहुंचा। 

इधर इस बॉयज लॉकर रूम की घटना का मनोवैज्ञानिक असर इतना खतरनाक होता है कि गुड़गांव के एक स्कूल में पढ़ने वाले एक लड़के को एक लड़की धमकी देती है कि अगर वह नहीं सुधरा तो उसका भी स्क्रीनशॉट शेयर कर दिया जाएगा। जिसके बाद वह लड़का डर के मारे आत्महत्या कर लेता है। 

साइबर सेल द्वारा की गई जांच में जो सामने आया उसे सुनकर सबके होश उड़ गए। लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि उसी ग्रुप के लड़कों के साथ पढ़ने वाली एक लड़की सिद्धार्थ नाम की फेक आईडी से लड़कियों के रेप का प्लान बना रही थी।

अब आप कहेंगे कि यह सब यहां बताने का क्या कारण हो सकता है? आप सबने तो यह सब सुना ही था। मैं भी जानता हूं कि आप सब जानते होंगे लेकिन यह भी जानता हूं कि दुर्भाग्य से आपने इन घटनाओं को बड़े हल्के में ही लिया होगा। बिल्कुल किसी प्राइम नेटफ्लिक्स के वेब सीरीज की कहानी की तरह। 

लेकिन यह कहानी जैसी घटना बिल्कुल भी नहीं है बल्कि डिजिटल बारूद पर खड़े हमारे सभ्य समाज की एक कड़वी सच्चाई है। जिसके धुएं से हमारी आने वाली पीढ़ी के बच्चे लहुलुहान हो रहे हैं और हमें इसका पता भी नहीं चल पा रहा है कि हमने लाइक, कमेंट और व्यूज के चक्कर में क्या-क्या खो दिया है। एक ऐसा अदृश्य संसार निर्मित हो रहा है जिसकी भयावहता हमें अब डरा रही है और इसके दोषी किसी दूसरे ग्रह के लोग नहीं है बल्कि हम और आप ही हैं। 

आज अगर आप और हम संस्कार के बीज डालने की उम्र में लड़कों के भीतर सस्ती लोकप्रियता का जहर डाल रहे हैं तो लड़के फैजल सिद्दीकी को फॉलो करके बॉयज लॉकर रूम का मेंबर बन जाए तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

टीवी, सिनेमा की गंदगी तो हम झेल ही रहे थे अब ओटीटी प्लेटफॉर्म वेब सीरीज के माध्यम से बेहिसाब गालियां, अपशब्द, सेक्स और हिंसा को हमारे समाज में बुरी तरह फैला रहे हैं। ओटीटी प्लेटफार्म पर ऐसे ऐसे वेब सीरीज दिखाए जा रहे हैं जिनको देखना पोर्न देखने जैसा ही है या उससे भी बदतर। ऐसे में 15 साल के बच्चों ने इंस्टाग्राम पर रेप का प्लान बनाया तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?
यह तो वही फल है जिसका हम सब मिलकर बीज बो रहे थे। 

आने वाला समय तो और भी खतरनाक होने वाला है। क्योंकि आने वाले समय में अगर आप अभिभावक है तो आपके लिए एक दूसरी चुनौती सामने आने वाली है या आ चुकी है। क्योंकि अब हम ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम के दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं।

आज में समय में मोबाइल और इंटरनेट सांस लेने से भी ज्यादा अनिवार्य होता जा रहा है। ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली प्राइमरी के बच्चों के हाथ में मोबाइल दे रहा है और हम एक ऐसी दुनिया बनाने जा रहे हैं जिसमें कि बच्चे बाहर जाकर कभी खेल भी नहीं सकते। 

उनको इंटरनेट और सोशल मीडिया पर खतरनाक गेम खेलाते रखना हम सबकी मजबूरी बनती जा रही है। यही कारण है कि इस विकट दौर में मासूमियत और संवेदना कैसे बचेगी यह एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। चुनौती यह है कि बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना भी है और जरूरत से ज्यादा ऑनलाइन रहने से बचाना भी है वरना उनका समग्र विकास ही रुक जाएगा। 

यदि सबकुछ ऐसे ही चलता रहा तो एक ना एक दिन इस डिजिटल बारूद की मार से वे मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से बीमार हो जाएंगे। इसलिए कुछ ऐसा सिस्टम विकसित करना पड़ेगा जिससे बच्चे का डिजिटल ही नहीं मैनुअल विकास भी हो। 

उसे पता चले कि यह उम्र वीडियो बनाने की नहीं बल्कि यह तो संगीत साहित्य कला के संस्कार विकसित करने की उम्र है और यह संस्कार 15 सेकंड के वीडियो बनाने जितने आसान नहीं होते हैं। यह उम्र फैजल सिद्दीकी जैसे टिकटोक स्टार को फॉलो करने की नहीं है। यह उस संस्कार को सीखने की उम्र है जिससे आगे चलकर तुम एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों को फॉलो कर सको। 

यह उम्र है एक कविता याद करने की जो कभी जीवन के अंधेरे में रोशनी कर सके। यह उम्र है अपनी मातृभाषा का कोई अच्छा गीत गाने की, लोक कथाएं याद रखने की। क्योंकि ये कथाएं ही है जो बच्चों पर एक क्रांतिकारी असर छोड़ती हैं। यहां जीजा बाइयों ने बेटे को गोद में कहानियां सुना सुना कर कब शिवाजी बना दिया पता ही नहीं चला। 

ऐसी ही राजा अमर शक्ति की कथा है। कभी वह भी अपने मूर्ख पुत्रों के रुके हुए बौद्धिक विकास से चिंतित थे उन्होंने विष्णु शर्मा नामक विद्वान की शरण ली। आचार्य विष्णु शर्मा ने 6 महीने में कथाओं के माध्यम से बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया जिससे कालांतर में बच्चे बहुत बुद्धिमान और तेजस्वी हुए। आज वही कहानियां पंचतंत्र की कहानियां के रूप में हमारे सामने हैं और जिन्हें बच्चों को पढ़ा और सुनाया जाता है। आज इनका अनुवाद दुनिया की हर भाषा में हो चुका है। यही इस कहानी की ताकत है कि जो टिक टॉक और कोई भी एप किसी जन्म में नहीं दे सकते। 

जानने की जरूरत है कि हम कविता कागज पर नहीं लिखते बल्कि संवेदना की स्लाइड पर उतारते हैं। फिल्मी डांस तो हम सीख लेंगे उस में कोई बुराई नहीं लेकिन सबसे पहले कथक भरतनाट्यम कुचीपुड़ी को समझना भी जरूरी है यही हमारी संस्कृति और संस्कार है जो बच्चों को बचाएंगे। इसी का महत्व हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति में बहुत अधिक था। यहां गौतम बुद्ध पहले बांसुरी बजाते थे और विवेकानंद पखावज। 

लेकिन न तो हम और न ही हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति आज तक समझ पाई है कि हम पाश्चात्य संस्कृति के मोह में है और पश्चात संस्कृति हमारे मोह में। उनके बच्चे आयुर्वेद, योग और भारतीय संस्कृति के बारे में सीख रहे हैं और हम TikTok पर वीडियो बना रहे हैं और ब्वायज लॉकर रूम पर दुखी हो रहे हैं।

अब वक्त है जबकि संभलना हम सबको है। यह चुनौती हम सबके सामने है कि हम अपने बच्चों को TikTok वाला डिजिटल डमी कलाकार बना रहे हैं या कि उसे एक प्रबुद्ध और जिम्मेदार नागरिक बना रहे हैं। 

वरना मैं एक बार फिर से कहूंगा कि आपके बच्चे के हाथ में जो स्मार्टफोन है वह महज एक फोन नहीं है बल्कि एक डिजिटल बारूद है और आप मूकदर्शक बनकर अपने बच्चे के हाथ में एक विनाशक बारूद दे चुके हैं। और बारूद तो सिर्फ विनाश ही कर सकता है सृजन कभी नहीं।

-संजय राजपूत
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