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लॉकडाउन और कोरोना संक्रमण के बीच पलायन करते मजदूरों का झुंड, आखिर क्यों?

आज न्यूज़ में देखा कि दिल्ली यूपी बॉर्डर (गाजीपुर) पर हजारों की संख्या में यूपी बिहार के लोग अपने परिवार सहित सिरों पर सामान लादे पैदल ही भागे चले जा रहे हैं। ये सभी दिहाड़ी मजदूर हैं जो गाँव से शहर में जाकर मजदूरी करते थे। इनका जीवन रोज कमाओ रोज खाओ के ढ़र्रे पर चलता है लेकिन कोरोना लॉकडाउन के कारण इनका कामधाम बन्द हो जाने से इनके सामने रोजीरोटी का संकट है। ऐसे में इनके सामने गाँव वापस लौटने के सिवा कोई चारा नहीं। मरता क्या न करता वाली कहावत है तभी तो 600-700 किलोमीटर का सफर पैदल ही भूखे पेट तय करने चल पड़े। कुछ तो ऐसे भी थे जिनके कंधों पर दुधमुंहे बच्चे भी भूखे प्यासे लदे हुए थे। 

बहुत ही विचलित कर देने वाला दृश्य था। सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि जिस देश में अधिकतर आबादी दो दिन भी बैठकर खाने की स्थिति में न हो उस देश में 21 दिन लॉक डाउन वो भी अचानक क्या सही निर्णय था? लेकिन कोरोना की भयावहता को देखते हुए सरकार के इस अचानक लिए गए निर्णय पर सवाल उठाना भी शायद सही नही होगा। 

हां लेकिन मुझे सरकार से ये शिकायत जरूर है कि उसे अपने देश की इस आबादी की आर्थिक स्थिति का ख्याल नहीं था क्या जब अचानक 21 दिन लॉक डाउन का निर्णय लिया गया? सरकार के पास तो पूरे आंकड़े मौजूद होंगे कि मजदूर वर्ग जो गांव से शहर आकर दिहाड़ी करते हैं वे कितनी संख्या में हैं और कैसे 21 दिन गुजारा करेंगे। 

एक ओर हमारी सरकार विदेश में फंसे अपने ऐसे अमीर नागरिकों को सकुशल वापस लाने के लिए एयर एम्बुलेंस और लैब तक भेज देती है जो चंद पैसों के लालच में अपने देश को लात मारकर विदेश चले गए थे। ऐसे धनाढ्य लोग जो हमारे देश के नागरिक होते हुए भी विदेशी जैसे ही हैं उनको सरकार इतनी तवज्जो दे रही है, वहीं अपने देश के ये गरीब जिनको न तो खाने को है न ही अपने घर वापस लौटने के लिए कोई साधन ही उपलब्ध है। 

सुविधा सम्पन्न ऐसे लोगों की मदद करके सरकार शायद दुनिया के सामने यह साबित करने में सफल होगी कि उसे अपने देश के नागरिकों की  बहुत फिक्र है और अपनी अच्छी इमेज भी बना लेगी लेकिन वास्तव में क्या सरकार अपने देश के इन गरीब जरूरतमंद लोगों के किये भी कुछ कर पाने की स्थिति में है। 

यदि सरकार सुविधा सम्पन्न लोगों की ही मदद करे और जरूरतमंद यूं ही भूखे प्यासे भटकते रहें तो ऐसी सरकार का क्या फायदा। क्या देश अमीरों से ही चलता है, या इसके निर्माण में इन मजदूरों का खून पसीना भी लगता है? 

गरीब और मजदूर वर्ग तो हमेशा से उपेक्षित ही रहा है लेकिन मोदी सरकार से मुझे कत्तई यह उम्मीद नहीं थी, क्योंकि वे खुद एक बेहद साधारण परिवार से आते हैं। उन्हें मजदूर वर्ग की स्थिति का भलीभांति ज्ञान होगा। 

ऐसे समय में जब देश में कोरोना महामारी स्टेज-3 तक पहुंच चुकी है और हर तरफ लॉक डाउन है तथा सोशल डिस्टनसिंग का ख्याल रखने की बात की जा रही और लोगों को घरों से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है, ऐसे में सवाल ये उठता है कि हजारों की संख्या में इन पलायन करते मजदूरों को रोकने कोई क्यों नही आया? कहां थी लाठी भांजने वाली दिल्ली पुलिस जो घर से सामान लेने निकलने पर पीटने लग रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि दिल्ली सरकार ने जानबूझकर इन मजदूरों को वहां से पलायन करने दिया हो? हो सकता है कि सरकार अपने सिर का बोझ हल्का करना चाह रही हो इसलिए इन मजदूरों को न रोक गया हो। वैसे भी आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमण के मामलों में तेजी से वृद्धि होने की संभावना है जिससे सरकार के लिए संभाल पाना मुश्किल ही होगा। 

बॉर्डर पर जबकि सीमाएं सील किये जाने की खबरें थी ऐसे में हजारों की संख्या में ये मजदूरों का झुंड लॉक डाउन में बिना किसी रोकटोक के कैसे निकल सकता है ये सोचने वाली बात है। इनके इस तरह झुंड में निकल पड़ने से आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमण की स्थिति बहुत ही भयावह हो सकती है।

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