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बचपन की यादें दूरदर्शन के संग

दूरदर्शन से हमारी पीढ़ी के हर व्यक्ति की बहुत सारी यादें जुड़ी हुई है। अब तो टीवी भी सिमटकर मोबाइल में आ चुका है, लेकिन वो दौर कुछ और था जब बहुत कम ही लोगों के यहां टीवी हुआ करता था और आस-पड़ोस के लोगों की भारी भीड़ जुट जाया करती थी टीवी देखने के लिए। हम खुशनसीब थे कि हमारे यहाँ उस जमाने में भी अपना टीवी हुआ करता था और टीवी देखने हमारे यहाँ आसपास के लोग भी आया करते थे। ये उस वक्त हमारे लिए बड़े गर्व की बात हुआ करती थी।

भारत में दूरदर्शन की शुरुआत 15 सितम्बर 1959 को हुई. उस समय इस प्रसारण का नाम ‘टेलीविज़न इंडिया’ रखा गया था. बाद में सन 1975 में इसका नामकरण ‘दूरदर्शन’ कर दिया गया.

मेरी पीढ़ी का हर व्यक्ति इस बात को स्वीकार करेगा कि दूरदर्शन ने हमारे बचपन और जीवन में अनगिनत रंग भरे. क्योंकि वो यादें मन को आज भी महकाती हैं। भारतीय संस्कारों युक्त हमारा दूरदर्शन चैनल हम सब परिवार सहित देखा करते थे। इसलिए सोचा क्यों न आज अपने बचपन की वो दूरदर्शन वाली यादें अपने पाठकों से शेयर करूँ।

सुबह की शुरुआत –दूरदर्शन-सुबह सवेरे

सुबह जब दूरदर्शन अपना रिले शुरू करता था, तो पहले एक छोटा गोल घूमता हुआ Feng shui के यिंग-यैंग (Ying-yang) जैसा टीवी पर आता था और साथ में धीरे धीरे बजने वाला म्यूजिक. उस छोटे से गोले को बड़ा होकर दूरदर्शन का Logo बनने में 5 मिनट भी नहीं लगते थे पर वो 5 मिनट सदियों से लम्बे लगते थे.

दूरदर्शन के Logo के नीचे दूरदर्शन का ध्येय वाक्य सत्यम, शिवम्, सुन्दरम लिखा होता था. जिसका मतलब मुझे बड़े होने पर पता चला. सत्यम, शिवम्,सुन्दरम का अर्थ है जो सत्य है, कल्याणकारी है वही सुन्दर है. दूरदर्शन का यह दर्शन (Philosophy) वाकई कितना सुन्दर था.

सुबह समाचार तो आते थे पर उसके बाद क्या…? 
याद नहीं रहा..हर रोज शायद कुछ शास्त्रीय संगीत भी आता था और सन्डे को सिख धर्म के भक्ति गीत का प्रोग्राम ‘गाओ साची बानी’ आता था.

 ‘सुबह सवेरे’ नाम का एक लाजवाब मॉर्निंग शो आता था. सुबह सवेरे एक बढ़िया, Stylish कार्यक्रम था. इसे होस्ट करती थी शिरीन और संजीव पालीवाल.

झकाझक सफ़ेद कपडे पहने हुए, मस्त उर्दू बोलते विपिन हांडा फिल्म समीक्षा करते थे. ज्ञान के साथ मनोरंजन, वो भी एक छोटे से कार्यक्रम में, यही बातें 'सुबह सवेरे' को बेहतरीन बनाती थी. इस प्रोग्राम में रोज किसी फिल्मी गायक का भी एक छोटा सा पार्ट होता था।

धारावाहिक 'फिर वही तलाश'
शायद वो 1990 का दौर था, उस वक्त दूरदर्शन पर रात में एक धारावाहिक आया करता था 'फिर वही तलाश' जिसके डायरेक्टर रवीना टण्डन के पिता लेख टण्डन हुआ करते थे। वो एक सीरियस टाइप का धारावाहिक था और मै उम्र में काफी छोटा था, तो उस सीरियल में मुझे कम इंटरेस्ट रहता लेकिन उस धारावाहिक का टाइटल सांग मुझे इस कदर पसंद था कि मैं सिर्फ वो कुछ सेकंड का टाइटल सांग जो चंदन दास ने गाया था उसे सुनने के लिए दीवाना रहता था। मैं तो वो पूरा सीरियल उस टाइटल सांग की वजह से ही देखा करता था। वो टाइटल सांग आज भी मेरे दिल के इतने करीब है कि उसे अक्सर सुनता हूँ...

उस गाने के बोल कुछ इस तरह थे...

कभी हादसों की डगर मिले,
कभी मुश्किलों का सफर मिले,
ये चराग मेरी राह के,
मुझे मंजिलों की तलाश है।
कोई हो सफर में जो साथ दे,
मैं रुकूँ जहाँ कोई हाथ दे,
मेरी मंजिलें अभी दूर हैं,
मुझे रास्तों की तलाश है।

दूरदर्शन समाचार

न्यूज़ शुरू होने से पहले एक छोटी सी Jingle बजती थी और समाचार शुरू होता था. समाचार की यह शुरुआत और म्यूजिक समय के साथ बदलती गयी।

शम्मी नारंग, शोभना जगदीश, गजाला अमीन, वेद प्रकाश, साधना श्रीवास्तव, सलमा सुल्तान आदि DD News readers हुआ करते थे, जो कि बड़े Serious मालूम देते थे और शायद ही कभी मुस्कुराते दिखे हों.

वे समाचार शुरू होने और अंत में एक बार जरा सा मुस्कुराते थे, पर वो भी एकदम औपचारिकता (formality) वाला.

उन समाचार वाचको को लिए मेरे मन में बड़ा आदर भाव था. मै उनको किसी राष्ट्रीय नेता से कम नहीं समझता था. न तो वो कभी रवीश कुमार जैसे तीखी बहस करते थे ना ही समाचार को Sensational बनाने के लिये बातों के पुल बनाते थे. नमस्कार बोल कर सीधे सीधे समाचार बोला…बस. 

15 मिनट हिंदी और 15 मिनट अंग्रेजी में समाचार आते थे. Serial देखने के इंतज़ार में हम खाने की थाली के सहारे न्यूज़ बस देख ही लेते थे.

जब चार लोग (हाँ ! वही चार लोग जो कि सदियों से हर बच्चे, बूढ़े और जवान की जिंदगी को मुश्किल बनाते आये हैं) बताते थे कि हमारा बच्चा पूरी न्यूज़ देखता है और News देख कर उसके notes भी बनाता है (नोट्स शायद खुद को Genius दिखाने के लिए या School Assembly में समाचार पढने के लिए), तो यह सुनकर मुझे कोई काम्प्लेक्स नहीं होता था बल्कि उस बेचारे पर तरस आता था...धत्त तेरे की ! क्या जिंदगी जी रहा है बेचारा.

फिल्म समाचार 

फिल्मों से जुड़ी न्यूज़ के नाम पर शायद बस राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा होती थी या किसी बड़े हीरो-हिरोइन के मृत्यु की सूचना. माइकल जैक्सन जब भारत आने वाला था और हम सबमे बड़ा उत्साह था. पर हम जानते थे दूरदर्शन तो भाव नहीं देने वाला Michael Jackson को, और यही हुआ भी.
समाचार में बस गिन कर 5 सेकंड दिए गए जैक्सन जी को. चमचम ड्रेस पहने एक Space craft में माइकल जी का आना और दो सेकंड का छोटा सा डांस स्टेप बस. कुल मिलाकर बस इतना ही दिखाया.

समाचार देख कर हम लोगों के मन में भी उनकी नक़ल करने के सुविचार आते थे. अख़बार से समाचार कागज पर लिख कर, मेज-कुर्सी लगाकर समाचार पढ़ने की एक्टिंग करने से मुझे असली में समाचार पढने का अनुभव होता था.

बचपन की खासियत होती है हम जो भी कुछ अपने आस-पास देखते है उसे खुद करने या नक़ल करने की कोशिश करते हैं. साधन न भी हो तो क्या हुआ….सीमित साधन, उपजाऊ दिमाग की क्रिएटिविटी और बालमन तीनो मिलकर असलियत का एहसास करा देते थे.

दूरदर्शन मूक बधिर समाचार 

दूरदर्शन एक जन प्रसारण का माध्यम था, इसलिए समाज के हर वर्ग की तरह मूक-बधिर लोगों के लिए रविवार को साप्ताहिक समाचार दोपहर में एक बजे के लगभग आते थे. इसमें दो न्यूज़ रीडर होते थे. स्क्रीन के कोने में एक छोटे से बॉक्स में एक मैडम समाचार पढ़ती थी और बाकी स्क्रीन में एक मोटी सी आंटी हाथ के इशारों से उसे व्यक्त करती थी.
हमारी Generation का शायद ही कोई बच्चा ऐसा होगा जिसने उन्हें देखकर कभी उनकी नक़ल(Copy) करने की कोशिश न की हो.

यह देखकर राहत महसूस होती है कि आज भी Doordarshan के समाचार वैसे ही सीधे और सटीक होते है. वैसे अनगिनत न्यूज़ चैनलों से हमें कई तरह के दृष्टिकोण जानने को मिलते है और जो चटपटी बहस देखने के प्रेमी हैं, उन्हें भी मजा मिलता है.

लेकिन Doordarshan एक National channel है, जिसे आज भी भारत में सबसे ज्यादा देखा जाता है. दूरदर्शन की यह जिम्मेदारी होती है कि वो निष्पक्ष होकर समाचार दिखाए. इसीलिए दूरदर्शन बाकि चैनलों की तरह समाचार नहीं दिखाता है. 

पूरी तरह भारतीय संस्कारों युक्त चैनल हुआ करता था हमारा दूरदर्शन, जिसके प्रोग्राम पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता था। अब तो अकेले में भी देखने में शर्म आये ऐसे ऐसे प्रोग्राम आते हैं तमाम चैंनलों पर। समाज का ढांचा ही बिगाड़ के रख दिया आज के चैनल्स और धारावाहिकों ने। 

सही मायने में देखा जाए तो बिकाऊ मीडिया के इस दौर में एक दूरदर्शन ही ऐसा समाचार माध्यम है जो आज भी पूर्णतः निष्पक्ष है और शायद वो दिन दूर नहीं जब लोग Fake और Paid न्यूज़ से परेशान होकर फिर एक बार दूरदर्शन का ही रुख करें।

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