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दिल्ली में BJP की हार और AAP की जीत का राज क्या है?

हर सच्चे देशभक्त को भाजपा की दुर्गति पर अफसोस होना ही चाहिए। इसलिए नही कि हम किसी पार्टी के कोर समर्थक हैं, बल्कि इसलिए कि स्वतंत्रता के बाद की सबसे मजबूत बीजेपी सरकार अपार जनसमर्थन के बावजूद लगातार अपना जनाधार खोती जा रही है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि यहां कांग्रेस जैसा पंगु विपक्ष है।

चुनाव के मद्देनजर हर मुद्दा सही गलत से परे हिन्दू मुसलमान में उलझा कर रख देना भी कहीं न कहीं नुकसानदायक साबित हुआ। मनोज तिवारी ने वोटिंग के ठीक पहले हमारे हनुमान जी, हमारे हनुमान जी करके मानसिक दिवालियेपन की हद पार कर दी।

"हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, 
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा"

बड़ी मुश्किल से इतनी मजबूत केंद्र सरकार मिली है। अभी भी वक्त है बीजेपी धर्म की राजनीति छोड़ दे। इनके सबसे बड़े दुश्मन वे अंध समर्थक है जो कठुआ रेप केस के अपराधियों से लेकर स्वामी नित्यानंद जैसों की रिहाई का स्वागत भारत माता की जय के उद्घोष से करते है।

आज दिल्ली के नतीज़ों के बाद लोग दिल्ली के वोटर्स को मुफ्तखोर, खैरात कहकर सवाल उठा रहे है। लेकिन आम जनता के लिए 200 यूनिट मुफ्त बिजली बहुत बड़ी सुविधा है। 

देश भर में फ्री की व्यवस्थाओं में अन्य सरकारों द्वारा दी गयी फ्री शौचालय, फ्री स्कूटी, फ्री साइकिल, फ्री उज्ज्वला, फ्री मोबाइल, फ्री लैपटॉप, फ्री गैस कनेक्शन, कार्डधारियों को फ्री चिकित्सा, दो रुपये किलो गेहूँ, कर्ज माफी और फ्री दारू को ही दिल्ली में पछाड़ रही है दो सौ यूनिट तक की फ्री बिजली। फिर इसकी लत भी तो नेताओं ने ही लगायी वोटर्स को।

वोटर्स भी अब अपना फायदा सबसे पहले देखने लगा है। उसे अब देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, तरक्की, विकास से पहले अपना लाभ दिखाई दे रहा है। हर आदमी स्वार्थी होकर जीने का प्रयास कर रहा है क्योंकि आम आदमी के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न घर-गृहस्थी चलाना, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, शादी जैसी मजबूरी की बेड़ियां होती हैं जो उसे स्वार्थी बनने पर मजबूर करती हैं।

दिल्ली में बच्चों को पढ़ाना देश के हर शहर से महंगा माना जाता था। केजरीवाल सरकार ने इस धारणा को बदलने पर काम किया और अपने पिछले 5 साल के कार्यकाल में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस पर पूरी तरह अंकुश लगाया और उसे बढ़ने नहीं दिया। इसके अलावा हाईटेक सरकारी स्कूल और फ्री कोचिंग जैसी सुविधाएं भी जीत में सहायक बनी।

दिल्ली के वोटर्स के निर्णय को कोसने का अर्थ दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र का अपमान है । इन्ही वोटर्स ने प्रधानमंत्री के लिए नरेंद्र मोदी जी को चुना है। 

दिल्ली लोकसभा की सातों सीटें बीजेपी के नाम है इसलिए मतदाताओं के विवेक और समझ पर सवाल वाज़िब नही है। सबसे बड़ी कमी BJP के उन सातों सांसदों की मानी जाएगी, जिन्होंने जनता से दूरी बनाए रखी और इसी वजह से लोग इनसे काफी नाराज भी हैं। मनोज तिवारी पूर्वांचल के हैं और दिल्ली में 10 हजार पूर्वांचल के वोटर्स में 100 को भी अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे। मनोज तिवारी को तो नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए।

दिल्ली में बीजेपी की हारी गई सीटों का विश्लेषण:- 

100 वोट- 8 सीट हारी 
1,000 वोट- 19 सीट हारी 
2,000 वोट- 9 सीट हारी

बीजेपी के लिए आत्ममन्थन का अलार्म क्योकि झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में फ्री बिजली नही थी और पार्टी को वहाँ भी पराजय का मुँह देखना पड़ा। 

अगली बार विधानसभा में स्थानीय मुद्दों को पूर्ण गम्भीरता से लेने की जरूरत है, वरना भाजपा की पराजय का दायरा बढ़ने की संभावना और बढ़ सकती है।

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